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कोरोना ‘नेगेटिव’ होना ठीक होने की गारंटी नहीं, मरीजों को ठीक होने में लग रहा वक़्त


प्रतीकात्मक तस्वीर

नई दिल्ली:

कोरोना नेगेटिव हो जाना मरीज के ठीक हो जाने की गारंटी नहीं है. देशभर में कोरोना नेगेटिव हो जाने के बाद भी मरीज़ कई तरह की समस्या बता रहे हैं. यही नहीं, कोरोना नेगेटिव होने के बाद मौत के मामले भी अब सामने आने शुरू हो गए हैं. राजस्थान के भीलवाड़ा की सहाड़ा विधानसभा सीट से विधायक कैलाश त्रिवेदी का मंगलवार सुबह निधन हो गया

72 साल के कैलाश त्रिवेदी तीन बार के विधायक थे, पिछले महीने कोरोना संक्रमित हुए, लेकिन नेगेटिव रिपोर्ट आने के बावजूद डायबिटीज के चलते कोरोना जैसी समस्याओं से जूझते रहे, और इसी दौरान गुरुग्राम के मेदांता अस्पताल में उनकी मौत हो गई. 

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दरअसल कोरोना नेगेटिव होने के बावजूद भी कुछ लोगों में इसकी समस्या बनी रह सकती है. अगस्त महीने में दिल्ली में दिल्ली सरकार के राजीव गांधी सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल में इन्ही कारणों के चलते पोस्ट कोविड क्लिनिक बनाया गया था. इस क्लीनिक में 7 हफ्ते में अब तक 361 मरीज़ कोरोना नेगेटिव होकर अपनी समस्या लेकर आ चुके हैं.

14 से 70 साल तक के मरीज़ पोस्ट कोविड क्लिनिक में अपनी समस्या लेकर आए हैं. 25-30% मरीज़ों ने मानसिक समस्या जैसे बेचैनी, घबराहट, अचानक से डर जाना, नींद और भूख कम लगना, अवसाद, उदासी और काम में ध्यान ना लगने की शिकायत की. ऐसी शिकायत करने वालों में 14 से 30 साल के जवान मरीज़ थे. 30-40 % लोगों ने थकान और बदन दर्द की शिकायत की. 20-25% लोगों ने सांस लेने में समस्या बताई. 45 से 70 साल के लोगों में ऐसा ज्यादा देखा गया. 5% लोगों ने शिकायत की कि उनकी सूंघने और स्वाद की शक्ति सामान्य नहीं हुई. 8% लोगों ने पेट दर्द और दस्त की शिकायत की.

उत्तर पूर्वी दिल्ली के ताहिर पुर में दिल्ली सरकार के कोरोना समर्पित राजीव गांधी सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल के कोविड नोडल अफसर डॉ अजीत जैन ने बताया ‘लगभग 361 मरीज अब तक यहां हमें दिखा चुके हैं इसमें से 25 फ़ीसदी के आसपास ऐसे हैं जिनको न्यूरोसाइकैटरिस्ट प्रॉब्लम है. बदन दर्द की भी समस्या है और उसकी परसेंटेज उससे भी ज्यादा है. सांस की तकलीफ वाले भी मरीज हैं जिनको पलमोनरी फाइब्रोसिस है या पहले ही जिनको दमा था या COPD था वो बढ़ गया. दिल के मरीज भी हैं जो पहले से ही दवाई खा रहे थे, जिनके स्टंट डले हुए हैं और बाईपास सर्जरी हुई हुई है जिनके वाल्व में खराबी है उनका भी ट्रीटमेंट बढ़ा रहे हैं. तो ये सारी की सारी समस्याएं हम संभालने की कोशिश कर रहे हैं.’

पोस्ट कोविड क्लीनिक के डॉक्टर बता रहे हैं कि नेगेटिव होने के बाद भी 3-4 महीने तक कुछ मरीज़ों को पूरी तरह से ठीक होने में लग जा रहे हैं. पोस्ट कोविड क्लिनिक के न्यूरोसाइकैटरिस्ट बताते हैं कुछ मामलों में रह रह कर सांस फूलने की समस्या देखी गई जबकि उनका ऑक्सीजन लेवल नापने पर सामान्य होता है. कई बार इसकी वजह फेफड़ों में नहीं होती बल्कि दिमाग मे हो रहे रासायनिक उतार-चढ़ाव के चलते ऐसा होता है. घबराएं नहीं डॉक्टर से संपर्क करें.

डॉ अनुभव भूषण दुआ, न्यूरोसाइकैटरिस्ट, पोस्ट कोविड क्लिनिक बताते हैं कि ‘एक बार जब आप सांस फूलने या सांस लेने में समस्या को डॉक्टर को दिखाते हैं और डॉक्टर ये देखकर ये पाता है कि यह फेफड़ों की वजह से नहीं हो रहा तो उसका आकलन इस तरह से किया जा सकता है कि रासायनिक स्तर पर हो रहे उतार चढ़ाव की वजह से मरीज घबराहट में आ जाता है और उसकी सांस चढ़ जाती है हाथ पांव में पसीना आ जाता है. तो घबराहट के कारण भी ये लक्षण हो सकते हैं ऐसे मरीज डॉक्टर से जरूर संपर्क करे.

दरअसल 30 जनवरी 2020 को भारत में इस वायरस का औपचारिक प्रवेश हुआ और अभी अक्टूबर का महीना चल रहा है. यही नहीं कोरोना वायरस के बारे में इसके जन्म स्थान चीन से भी जानकारी दिसंबर में ही मिली. यानी यह वायरस अभी नया है ऐसे में इसके बारे में बहुत सी बातें पुख्ता तौर पर नहीं कही जा सकती. इसलिए इस वायरस के अलग-अलग पहलुओं पर रिसर्च और स्टडी चल रही है. इसलिए जैसे जैसे समय बीत रहा है इसके बारे में नई नई जानकारी सामने आ रही हैं और उसी हिसाब से हमें अपनी जीवनशैली भी बदलनी पड़ रही है और उपचार भी उसी तरह से करवाना पड़ रहा है.



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