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चम्बल के बीहड़ों की ‘शान’ डेढ़ माह के लिए पुलिस थानों के मालखानों में बंद

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चम्बल के बीहड़ों की 'शान' डेढ़ माह के लिए पुलिस थानों के मालखानों में बंद

मुरैना जिले में लाइसेंसी बंदूकें पुलिस थानों में जमा कराई जा रही हैं.

भोपाल:

मध्यप्रदेश (Madhya Pradesh) में चम्बल (Chambal) के बीहड़ों में आन, बान और शान का प्रतीक मानी जाने वाली बंदूक (Gun) अब डेढ़ माह तक पुलिस थानों के मालखानों में जमा रहेगी. जिला दंडाधिकारी मुरैना (Muraina) के आदेश का उल्लंघन करने वाले शस्त्र मालिकों के लाइसेंस पहले निलंबित किए जाएंगे, फिर निरस्त किए जाएंगे. युवा हों या बुजुर्ग सभी सुरक्षा के लिए लाखों रुपये की कीमती बंदूकें रखते हैं. वे बताते हैं कि इन बंदूकों की सुरक्षा भी उन्हें करनी पड़ती है. अभी तक 80 फीसदी लाइसेंसी शस्त्र पुलिस थानों में जमा हो चुके हैं. इस डेढ़ माह के दौरान शस्त्रधारण करने वाले ग्रामीण अपनी सुरक्षा की व्यवस्था भी जैसे-तैसे कर ही लेंगे. 

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चम्बल अंचल के मुख्यालय मुरैना में लाइसेंसी शस्त्र धारकों की संख्या 30 हजार के लगभग है. मूलत: सुरक्षा के लिए लोगों ने लाखों रुपये से बंदूकें खरीदी हैं. मुरैना पुलिस की अनुशंसा पर जिला प्रशासन द्वारा लोगों को इन शस्त्रों के लाइसेंस प्रदान किए गए हैं. 

मुरैना में आज भी बंदूकों के प्रति युवाओं का आकर्षण कम नहीं हुआ है. प्रतिवर्ष 500 से 1000 शस्त्र क्रय करने के लिए जिला दंडाधिकारी द्वारा लाइसेंस जारी किए जाते हैं. ग्राम पंचायत से लेकर संसद के चुनाव के दौरान यह शस्त्र पुलिस थानों की शोभा बढ़ाते हैं. वर्तमान में भी 80 फीसदी लोगों ने अपने शस्त्र पुलिस के पास जमा कर दिए हैं. अबकी बार शस्त्र जमा करने की अंतिम तारीख तीन दिन और बढ़ाते हुए 9 अक्टूबर कर दी गई. जिन लाइसेंस धारियों द्वारा शस्त्र जमा नहीं कराए गए, सबसे पहले उनके शस्त्र लाइसेंस निलंबित किए जाएंगे और बाद में निरस्ती की कार्रवाई की जाएगी. 

किसी जमाने में इन बंदूकों से ग्रामीण व शहरी लोग अपनी सुरक्षा करते थे. मजबूत हाथों में यह बंदूक बीहड़ों से आने वाले बागियों, बदमाशों का रास्ता रोक देती थी. लेकिन अब 20 फीसदी तक यह रोजगार का बड़ा साधन बन गई है. ऑल इंडिया लाइसेंस बनवाकर युवा व अधेड़ सुरक्षा गार्ड की नौकरियां कर रहे हैं. आज भी नेता व मंत्रियों के सामने सबसे अधिक गुहार करने वाले बंदूक प्रेमी ही होते हैं. मुरैना के बंदूकधारी बुजुर्ग लोग स्वयं की सुरक्षा से ज्यादा बंदूक की रक्षा पर ध्यान देते हैं. चुनावों के दौरान यह बंदूकें पुलिस के पास जमा हो जाती हैं. तब बंदूक के बिना यह लोग रात-रात भर जागकर अपनी सुरक्षा करते हैं.

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