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Sunday Special: क्या कोरोना वायरस की महामारी के बीच खत्म हो जाएंगे खेल पत्रकार?

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Sunday Special: क्या कोरोना वायरस की महामारी के बीच खत्म हो जाएंगे खेल पत्रकार?

भारतीय कप्तान विराट कोहली प्रेस कॉन्फ्रेंस में

कोरोना वायरस (Coronavirus) के कारण मौजूदा समय में किसी भी खेल के बड़े टूर्नामेंट का आयोजन नहीं हो रहा है

नई दिल्ली. कोरोना वायरस (Coronavirus) के चलते पूरी दुनिया में उथल-पुथल मची हुई है और मीडिया जगत भी इससे अछूता नहीं है. लेकिन, अगर मीडिया में भी किसी एक ‘बीट’ को सबसे ज़्यादा नुकसान होता दिख रहा है तो वो है खेल पत्रकारिता. इसकी वजह साफ है. किसी भी तरह की प्रतियोगिता या टूर्नामेंट का न तो आयोजन हो रहा है और न ही आने वाले कुछ महीनों में इसकी उम्मीद दिख रही है. टीवी न्यूज़ चैन्लस में तो सामान्य समय में भी खेल की ख़बरें औऱ खेल के बुलेटिन ख़त्म होने के कगार पर थे लेकिन अब प्रिंट मीडिया में भी ये स्पेस ख़त्म होता दिख रहा है.

सोशल मीडिया पर एक्टिव हुए खिलाड़ी
इन सबके बीच जो सबसे बड़ी बात उभरकर सामने आयी है वो है खिलाड़ियों की सोशल मीडिया पर अति-सक्रियता. सोशल मीडिया के दौर में सेलेब्रिटी खिलाड़ियों के लिए हर एक फॉलोअर किसी राजनीतिक पार्टी की तरह एक वोट से कम नहीं है. ऐसे में अपने वोटर को आपको हमेशा खुश रखना होगा. सोशल मीडिया पर एक-एक पोस्ट से कई खिलाड़ी लाखों-करोड़ों की कमाई करते हैं और इसलिए आपको कभी रोहित शर्मा (Rohit Sharma) अपने हीरो युवराज सिंह (Yuvraj Singh) का इंटरव्यू करते दिखाई देतें है तो इरफान पठान (Irfan Pathan) अपने साथी सुरेश रैना के साथ इंस्टाग्राम चैट पर कई ऐसे मुद्दों पर इतनी बेबाकी से राय रखतें है कि शायद ही किसी पत्रकार के साथ वो इतना खुलें.

पत्रकार बन गए खिलाड़ीमशहूर क्रिकेट कामेंटेटर हर्षा भोगले ने हाल ही में इसी बात को और ज़्यादा हाइलाइट करते हुए ट्विटर पर एक बहस छेड़ दी.  भोगले का कहना था-

खेल पत्रकारों के लिए मौजूदा समय बेहद चुनौतीपूर्ण है. खिलाड़ी खुद पत्रकारों की भूमिका निभा रहें है और उनकी पहुंच भी ज़्यादा है. पत्रकार या तो इस हालात से समझौत कर लें या फिर अपना स्तर और बेहतर कर लें.

कई पत्रकारों ने भोगले को जवाब में तगड़े तर्क दिए लेकिन हमेशा की तरह भोगले ने उन्हीं लोगों को जवाब दिया जिसको वो अपने स्तर के लायक समझतें हैं. खैर, ये मुद्दा किसी और दिन के लिए ही सही जहां पर इस पर विस्तार से चर्चा होगी कि हमेशा चिकनी-चुपड़ी बातें करने वाले बड़े- बड़े टिपप्णीकार भी किस तरह से सिर्फ अब भी अंग्रेज़ी भाषा में ही क्रिकेट का संवाद करने वाले को गंभीरता से लेते हैं.

ये सच है कि खेल पत्रकारों के लिए चुनौतियां बढ़ी हैं लेकिन इस पेशे का ख़त्म होना मुश्किल दिखता है. भारतीय मीडिया तो पहले से ही इसका अभ्यस्त हो चुका है. युज़वेंद्र चहल अपनी गेंदबाज़ी के साथ-साथ अपने चहल टीवी के लिए भी उतने ही मशहूर है. दरअसल, खिलाड़ियों को भी राज-नेताओं की तरह इंटरव्यू का वही फॉर्मेट पंसद आता है जहां उनसे एक भी टेढ़े-मेढ़ें या विवादास्पद सवाल ना पूछें जाए. कई खिलाड़ी के लिए एजेंट सवालों की सूची मंगाने से नहीं हिचकतें है. ऐसे में खिलाड़ियों का इंटरव्यू करना अब भी खेल पत्रकारों के लिए सहज़ नहीं है और कोरोना काल की आदतों के बाद( मतलब अपने मन की बात सिर्फ अपने पसंदीदा साथियों से करो) खिलाड़ियों से ख़ास बात-चीत करना मुश्किल होगा.

पत्रकारों के पास होंगे नए विकल्प
सिक्के का दूसरा पहलू ये भी है कि हर दौर की मुसीबत अपने लिए नये विकल्पों को भी लेकर आती है. भारतीय खेल पत्रकारों को ज़्यादा दूर प्रेरणा के लिए जाने की ज़रुरत नहीं है. इंग्लैंड के मशहूर अख़बार द टाइम्स के मुख्य क्रिकेट संवाददाता माइकल एर्थटन हैं जो इंग्लैंड के पूर्व कप्तान रह चुके हैं और कामेंट्री बाक्स में हर्षा भोगले (Harsha Bhogle) से भी ज़्यादा लोकप्रिय और ज्ञानी है. इंग्लैंड में पूर्व खिलाड़ियों को फुल-टाइम खेल पत्रकार बनना कोई नई बात नहीं है. इससे पहले एंगेस फ्रेज़र और डेरेक प्रिंगल जैसे खिलाड़ी भी अलग अलग अख़बारों के लिए ये भूमिका निभा चुके हैं. लेकिन, इंग्लैंड में खेल पत्रकार आने बंद तो नहीं हुए. उल्टे, खेल पत्रकारिता का स्तर और बेहतर हुआ. वैसे भी, बहुत सारी ख़बरें और ऐंगल ऐसे होते हैं जो सिर्फ पत्रकारिता की ट्रेनिंग ले चुका एक अनुभवी पेशवेर ही न्याय कर सकता है.

आप रोहित शर्मा या चहल से हल्के-फुल्के और मज़ाकिया इटंरव्यू से ज़्यादा कुछ उम्मीद नहीं कर सकते हैं और वैसे भी शुरुआती दौर में एक नवीनता रहती है कि एक स्टार खिलाड़ी दूसरे खिलाड़ी से बातें कर रहा है. बाद में न तो खिलाड़ियों के पास इतना वक्त होगा और न ही खुद को प्रासंगिक बनाए रखने के लिए ऐसी बेकरारी. आखिर राहुल द्रविड़ (Rahul Dravid) जैसे महान खिलाड़ी भी तो हैं सोशल मीडिया से पूरी तरह से दूर हैं.

जो काम पत्रकार कर सकता है वो खिलाड़ी कभी न कर सकता
चलते-चलते आखिरी बात हमें ये नहीं भूलनी चाहिए कि ये खेल पत्रकार ही होता है जो धोनी जैसे कप्तान से भरी प्रेस कांफ्रेस में ये पूछ सकता है कि वो संन्यास कब लेंगे. ये एक पेशेवर पत्रकार ही होता है जो सचिन तेंदुलकर से रन नहीं बनने पर उनसे सवाल कर सकता है. ये खेल पत्रकार ही होता है जो विराट कोहली के बारें में ये ख़बर छापता है कि बीबीसाई ने कैसे प्रोटोकॉल को तोड़ते हुए गर्लफ्रेंड को होटल में साथ रहने की स्वीकृति दे दी है.

ये खेल पत्रकार ही होता है जो ये बहस छेड़ता है कि कैसे कोहली की बजाए रोहित शर्मा सफेद गेंद की क्रिकेट में बेहतर कप्तान का विकल्प हो सकतें हैं. ये खेल पत्रकार ही होता है जो पाठक को ये बतलाता है कि अज़हरुद्दीन और अजय जडेजा जैसे खिलाड़ी भले ही आज अलग दिखतें हैं लेकिन ये मैच-फिक्सिंग में शामिल थे. ऐसे कई सवाल और कहानियां जो सिर्फ और सिर्फ खेल-प्रेमियों के हित के लिए होती हैं वो कोई भी खिलाड़ी नहीं कर सकता है. कुछ दिन पहले आपको याद है न बीसीसीआई ने सुनील गावस्कर (Sunil Gavaskar) और रवि शास्त्री जैसे कामेंटेटर का मुंह आलोचना करने के लिए कांट्रैक्ट की दुहाई देकर बंद करा दिया था. ये बात तो खेल पत्रकार ही बतायेगा.

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First published: May 24, 2020, 8:25 AM IST



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